कत्था निर्मिती उद्योग कैसे शुरू करे । How to start Catechu making Business ।

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भारतीय आयुर्वेदिक उपचार पद्धति में कत्थे का उपयोग हजारों सालों से किया जा रहा है। पान खाने वाला बहुत बड़ा रसिक हमारे देश में मौजूद है जो कि कथ्य का यूज करता है। पान का रंग लाल होने के लिए इस कथित का इस्तेमाल हमारे देश में किया जाता है। इसके लिए हमारे देश में कत्थ के लिए बहुत बड़ा बिजनेस अपॉर्चुनिटी है। इस कारण आज के इस पोस्ट में हम जाने वाले है की , कथा निर्मिती उद्योग के बारे में। कथ्ये का यूज सादा पान, बनारसी पान , कलकत्ता पान इत्यादि में उपयोग किया जाता है। तो चलो पहले जानते है कत्थे का यूज कहां कहां किया जाता है । इसे हमें पता चलेगा कि कच्चे में कौन कौन से मार्केट अवेलेबल है।

कत्था का यूज

१) पान को लाल रंग देने के लिए कच्चे का यूज किया जाता है पान मसाले में इसका यूज ज्यादा किया जाता है । इसके लिए पान की दुकानों पर यह अवेलेबल होता है।

२) मेहंदी की पेस्ट में इसका यूज किया जाता है । मेहंदी लगाने के बाद उसमें लाल कलर आने के लिए उसमें नींबू और कत्था का उपयोग किया जाता है । इसके लिए मैंने मार्केट में इसकी बहुत डिमांड है।

३) आयुर्वेदिक उपचार पद्धति में इसका उपयोग बहुत ज्यादा किया जाता है ।इसका उपयोग जंतु नाशक के तौर पर किया जाता है।

४) उसी के साथ इसका उपयोग त्वचा रोगों में जंतु नाशक के तौर पर किया जाता है ।और उसी के साथ जख्म के ऊपर खून को रोकने के लिए किया जाता है । यह खून रोकने में बहुत कारगर साबित होता है ।इसके लिए इसकी डिमांड बहुत ज्यादा है।

कत्था कहां पाया जाता हैं ।

इसका बहुत सी राज्यो में पाया जाता है । इसके रुक्ष बहुत से राज्यों में पाए जाते हैं ।उसमें से कर्नाटक, बिहार, आंध्र प्रदेश ,मध्य प्रदेश, ओडिशा ,पंजाब ,बंगाल ,गुजरात और महाराष्ट्र इन जगह पर पाया जाते है। वैसे तो खैर के पेड़ों से कत्थ बनाया जाता है। खैर के पेड़ों से बनाया गया कत्था बहुत अच्छा दर्जा का माना जाता है । इसके लिए खैर के पेड़ों को कत्था बनाने के लिए ज्यादा यूज किया जाता है । वैसे तो वो पोपढ़ी और आंवला के पेड़ से भी कत्था बनाया जाता है । मगर उसका दर्जा इतना अच्छा नहीं होता। खैर के पेड़ों की डहेलिया अडी टेडी होती है । इस कारण इसका उपयोग कत्था बनाने के लिए किया जाता है।

कैसे बनता है कत्था

सबसे पहले खेर की लकड़ियों को काटा जाता है कटिंग मशीन से और उसके बाद उस लकड़ी से अर्क बनाया जाता है । वह अर्क को सूखाया जाता है। खैर के रुक्ष की लकड़ियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। और यह टुकड़े मिट्टी के बर्तन में चार-पांच घंटे सुखाए जाते हैं। उसके बाद जो अर्थ निकलता है उसे सूखने के लिए रख दिया जाता है और उसके छोटे-छोटे टिकिया तैयार की जाती है। कम से कम 1 से 2 हफ्ते तक छानकर वैसा ही रखा जाता है ।यूज सूखने से पहले गाढ़ा है तभी ही उसकी छोटी छोटी टिकिया बनाई जाती है ।

आधुनिक पद्धति से आज के टाइम में कत्था निर्माण किया जाता है ।ऑटोक्लेव पद्धति से स्वयंचलित यंत्र के द्वारा तथ तैयार किया जाता है ।फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट देहरादून इस संस्था से विकसित किए हुए तकनीक से कत्था और कच्चा यह दोनों उद्योग विकसित किए जाते हैं। कत्था का उपयोग ज्यादातर आयुर्वेदिक उद्योग में ही किया जाता है ।जैसे कि आयुर्वेदिक मेडिसिन में इसका उपयोग किया जाता है। कठेचू टॉनिक एसिड नामक द्रव कच्छी में पाए जाते है ।इसका उपयोग चर्म उद्योग में किया जाता है । कपड़ा उद्योग में किया जाता है ।

मार्केट

इसका उपयोग औषोधी निर्मिती उद्योग में किया जाता है । औषोदी कंपनी में इसकी मांग ज्यादा हैं। उसी के साथ कितना माल , पान टपरिया , देशी दवाई की दुकान इन जगह पर इसकी मार्केटिंग अच्छी हो सकती है। और इसके ग्राहक भी अच्छे आते है । इस करना आज के टाइम इसका बिजनेस करना बहुत अच्छा हो सकत है ।

रॉ मटेरियल

इस बिजनेस के लिए हमें खैर के वृक्ष कहा है वहीं पर इस बिजनेस कि शुरवात कर सकते है ।वृक्ष की खाल यह कच्चा माल होता है । उसी के साथ आप आवला , फोपली के साल का भी यूज काट सकत है ।मगर इसकी क्वालिटी इतनी अच्छी नहीं होती ।

मशीनरी

कत्था बनाने के लिए कट्टर मशीन , पैकिंग मशीन , टिकिया कटिंग मशीन , हंड मोल्डिंग मशीन इत्यादि मशीन कि जरूरत होती है ।

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